जौनपुर। डूबते हुए सूर्य को नमस्कार (अर्घ्य) का पावन पर्व डाला छठ महापर्व : डॉ अखिलेश्वर शुक्ला           
       
जौनपुर। प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि नहाय खाय से सप्तमी तिथि के प्रातः सूर्य देव को अर्घ्य देकर पूर्ण होता है। जिसकी तैयारी हफ्ते दस दिन पहले से शुरू हो जाता है। शुद्धता -पविञता का यह त्यौहार चतुर्थी तिथि को नहाय खाय से प्रारंभ होता है। 

आज के दिन ब्रती (महिलाऐं - पुरुष) सुबह नदी-तालाब-पोखरे के स्वच्छ जल में स्नान कर साफ-सुथरा वस्त्र धारण कर शुद्धतापूर्वक निर्मित प्रसाद भगवान गणेशजी एवं सूर्य देव को अर्पित करने के बाद ग्रहण करते है। जिसमें प्रायः लौकी,चना दाल, सेंधा नमक, देशी घी का प्रयोग किया जाता है। साथ ही विस्तर का त्याग कर जमीन पर सोना, ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। दुसरे दिन पंचमी को खरना के दिन केवल एक समय मिठा भात ( जाउर) खाकर रहते हैं। तीसरा दिन षष्ठी तिथि को 24 घंटे से अधिक समय के निर्जला ब्रत के साथ डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। चौथे दिन सप्तमी तिथि को प्रातः सूर्योदय के समय अर्ध्य के साथ ब्रत पूर्ण होता है। षष्टी तिथि को निर्जला उपवास एवं सायं काल में अस्तांचलगामी सूर्य को अर्घ्य देते हुए समाज को एक अत्यंत ही सुन्दर संदेश देने का भी कार्य यह त्योहार करता हैं। चारो दिन प्रसाद के लिए नए चुल्हे प्रयोग किया जाता है। प्रतिदिन लीपा जाता है। ब्रत के बाद पुनः उसका प्रयोग नहीं किया जाता है। बांस के बने सूप, दौरा, डलिया, डाला में श्रृंगार का सामान,पुआ, ठेकुआ, चना, चावल का बना लड्डू, मौसमी फलों को सजा कर ब्रती पुरा घर,परिवार,पड़ोसी, रिस्तेदारों एवं गाजे बाजे के साथ छठी माता की गीत गाती महिलाऐं जलाशय घाट तक जाती हैं, जहां परिवारजन आपस में ही एक दूसरे का सूर्य को अर्ध्य दिलाते हैं। यही सप्तमी तिथि को प्रातः सूर्योदय के समय अर्ध्य देकर ब्रत पूर्ण होता है। जल देने का पाञ (लोटा) या अन्य पाञ में स्टील या शीशा का प्रयोग नहीं किया जाता है। महिलाऐं नाक से लेकर माथे सर तक लम्बा मांग भरते जो दिखाई देती हैं - उसके पीछे पत्नी द्वारा पति के लम्बी आयु दीर्घायु होने की कामना का भाव है। इस दौरान नकारात्मक बातों से दूर रहना, किसी पर क्रोध -गुस्सा, अपशब्दों का प्रयोग नहीं करना, ब्रम्हचर्य का पालन करना जैसे सात्विक आहार ब्यवहार पर विशेष ध्यान रखना होता है। यह चार दिवसीय त्योहार केवल बिहार, उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि भारत के साथ साथ पश्चिमी देशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों द्वारा मनाया जाने लगा है। गांव देहात के साथ साथ बड़े शहरों में भी शासन प्रशासन एवं पुलिस महकमे को ब्यवस्था में लगना पड़ता है। स्थानीय सामाजिक संस्थाओं, कार्यकर्ताओं की भूमिका भी सराहनीय होती है।         
 
डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर -संकट काल में सहयोग, शुद्धता, स्वच्छता, सौहार्द के साथ साथ सामाजिक समरसता सहित यह त्योहार सादा जीवन उच्च विचार का संदेश देता है। प्रोफेसर (डॉ)अखिलेश्वर शुक्ला, पूर्व प्राचार्य/ विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान , राजा श्री कृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय जौनपुर

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